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βίşмίĻĻάhίʀʀάhмάήίʀʀάhέέм
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 01 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 1- पहली नसीहत,*
*★• अल्लाह सुब्हानहु व तआला का इरशाद है, ऐ ईमान वालों !*
*❁ • तुमको ये बात हलाल नहीं कि औरतों के (माल या जान के) जबरन मालिक हो जाओ और इन औरतों को इस गर्ज़ से मुक़य्यद (कैद) मत करो कि जो कुछ तुम लोगों ने इनको दिया है उसमें का कोई हिस्सा (भी इनसे) वसूल कर लो मगर ये कि औरतें कोई सरीह नाशास्ता हरकत करें,*
*❁• और इन औरतों के साथ खूबी के साथ गुज़रान किया करो (यानी खुश अखलाकी और नान नफ़्का की खबर गिरी)*
*❁ • और अगर वो तुमको ना पसंद हो तो (ये समझ कर बर्दाश्त करो कि) मुमकिन है कि तुम एक शैय ( चीज़) को ना पसंद करो और अल्लाह तआला उसके अंदर ( तुम्हारे लिए ) कोई बड़ी मुन्फ़ाअत ( दुनियावी व दीनी ) रख दे,*
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*®_ तर्जुमा - सूरह अन निसा- 19, मा'रफुल क़ुरान -2/349,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 02 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 2- दूसरी नसीहत ,*
*★• प्यारे भाई ..रसुलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:: -*
*❁ • औरतों के साथ भलाई का अहतमाम किया करो, क्योंकि औरत पसली से पैदा की गई है और पसली में ज़्यादा टेढ़ा उसका ऊपर का हिस्सा है,*
*❁ • इसलिए अगर तू उसे सीधा करने लगेगा तो उसे तोड़ डालेगा और अगर छोड़ेगा तो वो टेढ़ी ही रहेगी, लिहाज़ा औरतों के साथ भलाई का अहतमाम किया करो,*
*®_ मुस्लिम शरीफ,*
*❁ • इसलिए प्यारे मुसलमान भाई आपको चाहिए कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस नसीहत व वसीयत पर अमल करने की नीयत करते हुए आज से ही आप अपनी बीवी के साथ हुस्ने सुलूक शुरू कर दें,*
*❁ ・उसकी कोताहियों से दरगुजर करें, अपने मिज़ाज के मुवाफ़िक़ 100 फ़ी सदी उसको ढ़ालने की कोशिश में वक़्त ज़ाया ना करें,*
*❁ ・क्योंकि औरत का शोहर की तबीयत के ख़िलाफ़ होना कोई ऐब नहीं है कि उनकी फ़ितरत का तकाज़ा यही है कि वो टेढ़ी हो, पसली का ऐबदार टेढ़ा़पन होना इसका ऐब नहीं बल्कि उसका हुस्न है,*
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*®_ तोहफ़ा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 03 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 3- तीसरी नसीहत,*
*★• प्यारे भाई.! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,:-*
*❁ • बे पर्दा औरत शैतान की सूरत में आती है और शैतान की सूरत में जाती है, लिहाज़ा जब तुममे से कोई किसी (अजनबी) औरत को देखे (और वो उसे पसंद आए) तो फौरन अपनी बीवी के पास आए, क्योंकि ये (आना) उस ख्वाहिश को खत्म कर देगा जो उसके दिल में पैदा हुई,*
*®_ मुस्लिम शरीफ,*
*❁ • अव्वलन पूरी कोशिश करे कि किसी ना-महरम पर निगाह ही ना पड़ने पाए और खुदा ना ख्वास्ता अगर ऐसा हो जाए तो फौरन नज़रे हटा कर ये दुआ पढ़ें:-*
*”_ अल्लाहुम्मा इन्नी आउज़ुबिका मिन फितनतिन निसा _”*
*❁ • याद रखिए आपने अपनी निगाहों की हिफाज़त कर ली तो आपकी औलाद भी अफीफ और पाकीज़ा होगी,*
*❁ •इसलिए निगाह चश्मी और निगाह क़ल्बी ( यानी ना-महरम का तसव्वुर ) दोनों की हिफाज़त करने की कोशिश करें,*
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*®_ तोहफा ए दुल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 04 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 4- चौथी नसीहत,*
*★• प्यारे भाई ! रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: –*
*❁ • क़यामत के दिन अल्लाह तआला के यहाँ मर्तबा के ऐतबार से बुरा शख़्स वो होगा जो (दुनिया में) अपनी बीवी से वज़ीफ़ा ए ज़ौजियत अदा करे और फिर उसकी पोशीदा बाते ज़ाहिर करता फिरे,,*
*®_ मुस्लिम शरीफ़,*
*❁ • अपनी बीवी के हुस्न की तारीफ़ दोस्तों के सामने हरगिज़ ना करें, अगर कोई बे-तकल्लुफ़ दोस्त पूछे तो सिर्फ़ यूँ कह दीजिए, ”अल्हम्दुलिल्लाह मै मुतमइन हूं,,”*
*❁ • इसी तरह खुद भी किसी ना-मेहरम औरत के बारे में बीवी से बिल्कुल न पूछे, न उसके बतलाने पर सुनें,*
*❁ • बल्कि फौरन चुप कर दे और समझाए कि, मुझे किसी औरत के जिस्मानी खद व खाल (हुस्नो जमाल) या बोल चाल के बारे में बिल्कुल ना बताना, वर्ना उस गुनाह की नहुसत ये होगी कि तुम्हारी और मेरी मुहब्बत में फ़र्क आ जाएगा,,,“*
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*®_ तोहफा ए दुल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 05 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 5- पाँचवी नसीहत,*
*★• प्यारे भाई ! अल्लाह तआला का फरमान है:-*
*❁ • मर्द हाकिम है औरतों पर इस वजह से कि अल्लाह तआला ने बाज़ो को (यानि मर्दों को) बाज़ो पर (यानि औरतों पर कुदरती) फजी़लत दी है और इस वजह से कि मर्दों ने (औरतों पर) अपने माल खर्च किए हैं,*
*❁ • सो जो औरतें नेक हैं वो इता'त करती हैं, (और) मर्द की गैर मौजूदगी में (भी) हिफाज़त ए इलाही (उसकी आबरू व माल की) निगाहदाश्त करती हैं,*
*❁ • और जो औरतें ऐसी हों कि (तुमको क़ुरान से) उनकी बद-दिमागी का अहतमाल हो तो उनको (पहले तो) ज़बानी नसीहत करो, और (ना माने तो) उनको उनके लेटने की जगहों में तन्हा छोड़ दो,*
*❁ •और (इससे भी ना माने तो) उनको (ऐतदाल के साथ) मारो, फिर अगर वो तुम्हारी इता'त करना शुरू कर दें तो उन पर (ज़्यादती करने के लिए) बहाना (और मौक़ा) मत तलाश करो,*
*❁ • क्योंकि बिला शुबहा अल्लाह तआला बड़ी रफ़अत और अज़मत वाले हैं,*
*®_ सूरह अन-निसा, 34, तर्जुमा: मार्फुल कुरान, जिल्द 2 सफ़ा 393,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा ____,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 06 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ 6- छठी नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई ! हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अनहुम इरशाद फ़रमाते हैं:-*
*❁ • मैं अपने आपको बीवी के लिए आरास्ता करता हूँ जैसे कि वो अपने आपको मेरे लिए आरास्ता करती है (सजती संवरती है),*
*❁ • और मै ये पसंद नहीं करता कि उससे सफ़ाई सुथराई का अपना तो पूरा हक़ वसूल करूँ और उसका हक़ जो मुझ पर वाजिब हो जाए उसमें कोताही करूँ,*
*❁ • इसलिए कि अल्लाह तआला का इरशाद है,”और औरतों का भी हक़ है जैसा कि मर्दों का उन पर हक़ है क़ायदे के मुवाफ़िक,”*
*"_यानी ये मुनासिब नहीं कि खुद तो बीवी से ये चाहूँ कि जब उस पर नज़र पड़े तो वो आरास्ता व परास्ता (सजी संवरी) हो और खुद बिखरे बाल, गंदी टोपी, मेला कुर्ता, बुझा हुआ चेहरा लिए हुए हूँ,*
*❁ •ऐसा कभी ना करे, खुद भी अपना ख्याल रखे ताकि जिस्म भी ठीक हो, बाल दाढ़ी खूबसूरत लगे, चेहरा बा-रोनक हो और इसकी कोशिश करें कि हमेशा जिस्म से खुशबू आए, ( यानी इत्र का और गर्मियों में सुबह शाम गुस्ल का अहतमाम करें)*
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*®_ तोहफा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 07 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 7- सातवीं नसीहत,*
*★•मेरे प्यारे भाई.! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बीवी के हक़ (लफ्ज़ ” हक़ ” याद रहे कोई रिआयत और अहसान नहीं ) के बारे में सवाल किया गया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि: –*
*❁ • उसे खिलाएं जब तू खाए और अपनी बीवी को पहनाएं जब तू पहने, और उसके चेहरे पर ना मार और उसे बुरा भला ना कह (यानि उसकी सूरत और सीरत में ऐब ना निकाले,)*
*❁ • और उसे (अगर तंबीह के तौर पर खुद से अलग करना है तो) घर के अंदर ही अलग करें यानि उसी मकान में रख_ ”*
*®__ अबू दाऊद,*
*❁ • लिहाज़ा मुसलमान शौहर इस बात को जान ले कि ससुराल में बीवी जो कुछ खाती है ये उसका हक़ है, जो कुछ पहनती है ये उसका हक़ है, उस पर कोई अहसान नहीं है,*
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*®____ तोहफा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 08 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 8- आठवीं नसीहत,*
*★• प्यारे भाई.!रसुलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया-*
*❁ • कोई मोमिन (अपनी) मोमिना (बीवी) से नफ़रत ना करे, अगर उसकी (बीवी की) कोई आदत उसको नापसंद है तो हो सकता है कि दूसरी (कोई) सिफ़्त उसको पसंद भी हो,*
*®_ मुस्लिम,*
*❁ • शहद की मक्खी अच्छाई तलाश करती है इसलिए कीचड़ में भी कंवल पर ही बैठती है, आम मक्खी गंदगी ही तलाश करती है इसलिए बाग में भी ग़लाज़त पर ही बैठती है,*
*❁ • बस इस उसूल के तहत अपनी बीवी में अच्छाई तलाश करोगे तो यक़ीनन मिल जाएगी, और उससे नफ़रत मुहब्बत में बदल जाएगी,*
*❁ • याद रहे ये शायरी नहीं हक़ीक़त है, अल्लाह तआला और रसूलुल्लाह ﷺ का हुक्म है, अमल करके देखिए इंशा अल्लाह तआला काया पलट जाएगी,*
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*®__ तोहफ़ा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 09 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 9- नवी नसीहत,*
*★• प्यारे भाई.! अल्लाह तआला का इरशाद है:-*
*❁ • ए ईमान वालों तुम अपने को और अपने घर वालों को (दोज़ख की) उस आग से बचाओ जिसका ईधन आदमी और पत्थर हैं,*
*❁ • जिस पर सख़्त दिल (और) मज़बूत क़वी फ़रिश्ते (मुतइयन) हैं जो खुदा की (ज़रा) ना-फ़रमानी नहीं करते किसी बात में जो उनको हुक्म देता है,*
*❁ • और जो कुछ उनको हुक्म दिया जाता है उसको (फ़ौरन) बजा लाते हैं,*
*®_ सूरह तहरीम, आयत नंबर 6 – तर्जुमा मार्फ़ुल क़ुरान,*
*❁ • वज़ाहत:- यानि खुद भी नेक बनें और अपने घर वालों को भी दीनदार बनाने के लिए खूब मेहनत और दुआएं करें,*
*❁ •बे-दीनी ही दोज़ख तक ले जाती है घर वालों को दीन दार बनाने की आसान तरकीब यह है कि-*
*❁ • 1- उन्हें अल्लाह के रास्ते में वक़्त लगाने के लिए अक्सर ले जाएं,*
*❁ •2- नेक सालेह बुज़ुर्गों के बयान सुनाएं,*
*❁ • 3- मुस्तनद दीनी किताबें पढ़ने के लिए दें,*
*❁ • 4- हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद और तिलावत करने के बाद उनकी इस्लाह और हिदायत के लिए अल्लाह से खूब खूब दुआएँ माँगे,*
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*®_ तोहफा ए दुल्हा_,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 10 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 10- दसवीं नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई ! रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: –*
*❁ • औरतों के मामले में अल्लाह से डरो, तुमने उन्हें अल्लाह तआला के अमान के ज़रीए हासिल किया है, और उनकी शर्मगाहों को अल्लाह तआला के कलमे के ज़रीए हलाल किया है,*
*❁ • उन पर तुम्हारा हक़ है कि वो तुम्हारे घर में उन लोगों को ना आने दे जिनको तुम नापसंद करते हो,*
*❁ • अगर वो ऐसा करें तो उनको मारो मगर ऐसी मार जो ज़्यादा शहीद ना हो (और चेहरे पर हरगिज़ ना हो),*
*❁ • और उनका तुम पर ये हक़ है कि तुम उनके नान नफ़्क़ा और कपड़े की दस्तूर के मुवाफ़िक़ ज़िम्मेदारी पूरी करो,*
*®_ मुस्लिम शरीफ़,*
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*®__ तोहफ़ा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 11 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 11- ग्यारहवीं नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई ! अमीरुल मोमिनीन सय्यदना उमर इब्ने खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु इरशाद फ़रमाते हैं:-*
*❁ • मर्द को चाहिए कि अपने घर के अंदर खुश कलामी, खंदा पेशानी और उनसियत के ऐतबार से बच्चे की तरह हो,*
*❁ • और जब घर से बाहर लोगों के साथ हो तो फिर भरपूर मर्द बन जाए,*
*❁ • हर मुसलमान शोहर इस नसीहत पर अमल कर ले तो यक़ीनन घरों के कई झगड़े, कई तलाके, मायके बैठ जाना, खुला ले लेना वगैरा बहुत सी परेशानियां खत्म हो जाएं,*
*❁ • तजुर्बा करके देख लीजिए ये उस जलीलुल क़द्र सहाबी और अमीरुल मोमिनीन की नसीहत है जिसके बारे में हुज़ूर अकरम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अगर मेरे बाद कोई नबी होता तो उमर होता,”*
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*®_ तोहफ़ा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 12 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 12- बारहवीं नसीहत,*
*★•.मेरे प्यारे भाई ! रसूलुल्लाह ﷺ इरशाद फरमाते हैं -*
*❁ • मुसलमान मर्द का हर खेल बातिल है सिवाय तीरंदाज़ी और घोड़े की तरबियत और अपनी बीवी के साथ हंसी मज़ाक के कि यह सही है,*
*®_ तिर्मिज़ी ,*
*❁ • इत्तेबा ए शरीयत बड़ी अजीब चीज़ है काश हम मुसलमान आज उसकी हक़ीक़त मालूम करते और अपनी माशरत व मामलात में सो फी सदी दीन के अहकामात को ज़िंदा करने की कोशिश करते तो हर घर जन्नत का नमूना बनता,*
*❁ • इस एक हदीस से ही अंदाज़ा लगा लीजिए कि घर वालों के साथ प्यार मुहब्बत करना, उनके साथ हंसी मज़ाक करना, उनकी ज़ायज़ ख्वाहिश पूरी करने की फ़िक्र करना इन सबको हक़ में शुमार किया गया,*
*❁ •और उन पर भी ऐसा ही अजर् व सवाब मिलेगा जिस तरह निफ़्ली इबादत पर मिलता है, अगर नीयत सवाब और अल्लाह तआला को राज़ी करने की हो,*
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*®_ तोहफ़ा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 13 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 13- तेहरवी नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई ! रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फरमाया-*
*❁ • मोमिनो में सबसे कामिल ईमान वाला वो शख़्स है जो सबसे बेहतर अख़लाक़ वाला हो और अपने घर वालों के साथ नर्मी और अच्छा बर्ताव करने वाला हो,*
*®__ तिर्मिज़ी,*
*❁ • खुश क़िस्मत है वो मुसलमान जो ज़ाहिरी चीज़ों में भी हुज़ूर अकरम ﷺ की इत्तेबा करे और अखलाक, मामलात, माशरत और ज़िंदगी के हर शोबे में सुन्नत की इत्तेबा की कोशिश करे,*
*❁ • इत्तेबा ए सुन्नत इंसान की दुनिया भी बनाती है आख़िरत भी बनाती है और ज़िंदगी को संवारती है,*
*❁ • हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि आप ﷺ ने सारी उम्र अज़वाजे मुताहरात रज़ियल्लाहु अन्हुम में से ना सिर्फ़ यह कि किसी पर हाथ नहीं उठाया बल्कि जब भी घर के अंदर दाखिल हुए तो चेहरे मुबारक पर तबस्सुम होता था,*
*❁ • आप भी सच्चे मुहम्मदी होने का सबूत देते हुए इस एक सुन्नत पर अहतमाम से अमल करते हुए अपने रब से जा मिलिए,*
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*®__ तोहफ़ा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 14 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 14- चौदहवी नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई ! रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:-*
*❁ • जब तुममें से कोई किसी औरत से निकाह करे या ख़ादिम खरीदे (रखे) तो ये कहे, ए अल्लाह ! मैं आपसे इसकी खैरो बरकत का और इसकी पैदाइशी ख़सलत की खैरो बरकत का जिस पर आपने इसको पैदा किया है सवाल करता हूँ,*
*❁ • और ए अल्लाह ! मैं आपसे इसकी शरारत से और जिस शरारत पर ये पैदा हुआ पनाह माँगता हूँ,*
*❁• फिर उसकी पेशानी के बाल पकड़कर उसके लिए बरकत की दुआ करे,*
*®_ अबू दाऊद,*
*❁ • दुआ के साथ अपनी निगाहों की भी ना-मेहरम औरतों से हिफाज़त करे, चाहे वो भाभी हो, खालाज़ाद हो, मामूज़ाद हो या साली हो,*
*❁ • इस तरह निगाहों की हिफाजत से बीवी के दिल में आपकी और आपके दिल में बीवी की सच्ची मुहब्बत पैदा होगी*
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*®_तोहफा ए दूल्हा _,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 15 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 15- पंद्रहवीं नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई ! रसूलुल्लाह ﷺ से किसी ने सवाल किया :-*
*❁ • हममें से एक आदमी बीवी के पास जाता है और उससे सोहबत करता है क्या उसके लिए इस अमल की वजह से भी अजर् है ?*
*❁ •आप ﷺ ने जवाब में फरमाया- तुम बताओ अगर वो आदमी अपनी शहवत किसी हराम जगह पूरी करता उस पर गुनाह होता ? तो इसी तरह जब उसने हलाल जगह शहवत पूरी की तो उसके लिए इसके बदले अजरो सवाब होगा,*
*®_ मुस्लिम शरीफ,*
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*®__ तोहफा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 16 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ 16- सोलहवीं नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई ! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया ;-*
*❁ • जब तुममे से कोई अपनी बीवी के पास (सोहबत के इरादे से) आए तो ये दुआ पढ़े-*
*❁ • ”शुरू अल्लाह के नाम से, ऐ अल्लाह शैतान को हम दोनों से दूर कर दे, और इस मिलाप की वजह से आपने जो हमारे लिए औलाद लिख दी है उनसे भी शैतान को दूर कर दे,”*
*❁ • (हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं) अगर इस मिलाप से बच्चा पैदा हुआ तो (इंशा अल्लाह) शैतान उसको कोई नुक़सान नहीं पहुंचा सकेगा,*
*®__ बुखारी शरीफ __,*
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*®__ तोहफा ए दूल्हा __,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 17 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ _ दूल्हे की दुल्हन को पहली रात की नसीहत ⊙*
*❁ • • जिस तरह आप दुल्हन को पहली बार देखकर उससे दिलजोई की बात करेंगे, वहां मिनजुमला बातों से उसको ये नसीहत भी ज़रूर करें,*
*❁ • जिस तरह तुम ज़ेवर और कपड़ों से आरास्ता व पेरास्त होकर खुश हो रही हो, उससे ज़्यादा मैं खुश होऊंगा जब तुम मेरी नसीहत पर दिल व जान से अमल करोगी, क्योंकि तुम्हारी खूबियां तुम्हारा सबसे बड़ा ज़ेवर होगी,*
*❁ • अगर कभी मेरी वालिदा या बहनें या दूसरी भाभियां तुमसे किसी मामले में ऐसा बर्ताव करे जो तुम्हारे नज़दीक नामुनासिब या बुरा हो या वाक़ई उनसे तुम्हारे मामले में कोई गलती या ज़्यादती भी हो जाए तो उस पर छोटी बनकर अल्लाह पाक को राज़ी करने के लिए और आलमे आखिरत में उस पर बहुत ज़्यादा अजरो सवाब पाने के लिए सब्र कर लेना और मुझसे शिकायत न करना,*
*❁ • ऐसा न हो कि तुम बार बार मुझसे कहो कि आपकी वालिदा ने मेरे साथ ये बर्ताव किया है, या आपकी बहन ने मुझे ऐसा कहा है, या आपकी भाभी तो सीधे मुंह मुझसे बात ही नहीं करती, या आपके भाई बहन के बच्चों ने मेरी फलां चीज़ खराब कर दी मगर ना आपकी भाभियों ने रोका ना आपकी बहनों ने,*
*❁ • या मेरे पके हुए खाने में आपकी अम्मी जान या बहनों ने दस ( 10 ) ऐब निकाले वगेरा वगेरा,*
*❁ • याद रखना ! अगर तुमने इस तरह की बातें कीं तो इसका सबसे बड़ा नुक़सान ये होगा कि मेरा दिल तुमसे ही बुरा हो जाएगा और खुदा ना करे अगर मैंने तुम्हारी बातें सुन कर और उनको सो फीसदी (100℅) सही समझ कर अपनी वालिदा मोहतरमा की शान में गुस्ताखी कर दी तो हम दोनों की दुनिया व आखिरत दोनों बर्बाद हो जाएगी,*
*❁ • इसलिए याद रखना कि मर्द थके मांदे काम से घर में सुकून हासिल करने के लिए आते हैं, अगर बीवियां सास और ननद के झगड़े की तफसीलात शोहर को बताने लगीं तो उनकी क्या कैफियत होगी लिहाज़ा तुम इससे बचना,*
*❁.. इंशा अल्लाह तुम खुद ही इसके फायदों का मुशाहिदा करोगी,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 18 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞_ दूल्हा अपनी वालिदा, बहनों से अर्ज़ कर दे ⊙*
*❁ •• दूल्हा साहब आप अपनी वालिदा और बहनों से भी ये अर्ज़ कर दें,*
*❁ • आपसी शिकायतें आपको हरगिज़ न बताएं बल्कि उन्हें खुद ही हुस्ने तदबीर और सब्र व तहम्मुल के साथ निमटा दिया करे,*
*❁ • घरेलू झगड़ों के मुताल्लिक़ मेरी बीवी की कोई बात मुझे ना बताइए,*
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*®__ तोहफ़ा ए दुल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 19 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞_ सास बहु में मुहब्बत पैदा करने का आसान नुस्खा,*
*❁ • इसकी बहुत ही आसान तदबीर ये है कि अपनी बीवी के जरिए अपनी वालिदा को उनकी पसंद के मुवाफ़िक हदिया दिलवाएं,*
*❁ • जो चीज़ आप वालिदा के लिए लाएं वो बजाए आप खुद उन्हें देने के बीवी के हाथों दिलवाएं,*
*❁ • और जब भी आपकी अहलिया अपने मायके जाए तो उसे ताकीद करें कि वो वापसी पर अपनी सास और ननदों और भाभियों और उनके बच्चों के लिए कुछ न कुछ तोहफ़े ज़रूर ले कर आएं, चाहे मामूली ही क्यों न हो और अपने हाथों से उनकी खिदमत में पेश करें,*
*❁ • यक़ीनन इस तर्जे अमल से, इस तरह हदिये देने से आपस में मुहब्बत बढ़ेगी और दुआएं अलग मिलेंगी,*
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*®__ तोहफा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 20 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ 20- बीसवीं नसीहत,*
*★• मेरे प्यारे भाई !*
*❁ • बराए मेहरबानी, अल्लाह के वास्ते, बीवी से सुनी हुई बात पर वालिदा या छोटे भाई बहनों को कुछ न कहिए,*
*❁ • और वालिदा और बहनों की ना-जायज़ शिकायतों की वजह से बगैर तहकी़क़ के बीवी पर भी ज़ुल्म ना कीजिए,*
*❁ • बराए मेहरबानी, अल्लाह के वास्ते, बीवी से सुनी हुई बातों की वजह से अपनी वालिदा को कभी कुछ न कहिएगा कि वालिदा की आह निकलने से दुनिया व आखिरत दोनों बर्बाद होने का अंदेशा है,*
*❁ •वालीदा की वाक़ई गलती सामने आ भी जाए तो प्यार व मुहब्बत से समझाने की कोशिश करें, बड़ी बहन के ज़रिए समझाइए,*
*❁ •बीवी से वालिदा को हदिया दिलवाइए, हदीस में आता है, ”हदिया लिया दिया करो, इससे आपस में मुहब्बत बढ़ेगी,”*
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*®__ तोहफ़ा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 21 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ _ सुहाग रात- एक ज़रूरी वजाहत,*
*❁ • अफ़सोस है कि आज बेहया माशरे ने हमें इतना बेहया बना दिया कि हम सुहागरात को एक खेल, तमाशा और सिर्फ़ जिस्मानी ख्वाहिश को पूरा करने का एक ज़रिया समझ रहे हैं,*
*❁ • हद तो तब होती है जब हमारे भाई इस रात के लिए, नंगी तस्वीरें, ब्लू फ़िल्मों की नंगी और बेहुदा क्लिपिंग के ज़रिए शैतानी तरीक़ों से अपनी जिन्सी तस्कीन करते हैं, जिन तरीक़ों पर अल्लाह की लानत होती है,*
*❁ • नई ज़िंदगी की शुरुआत शैतान को साथ लेकर नहीं बल्कि खुदा को साथ ले करिए, इंशा अल्लाह ज़िन्दगी खुशगवार गुज़रेगी,*
*❁ •याद रखिए कि शादी से पहले ना- पुख्ता आलिम या गैर तजुर्बेकार दोस्तों से इस मोज़ू पर ना खुद बात करे ना उनकी कहीं हुई बातों पर तवज्जो दे, बल्कि सिर्फ़ ये 2 काम करें:-*
*❁ •1- मोअतबर मुफ़्ती हज़रात से अहम मसाइल नोट करके पूछ ले ताकि ज़ोजा के साथ के मामूलात मामलात में शरई और मसनून तरीक़ा आपके सामने आ जाए और निकाह से कुछ पहले बुज़ुर्ग उलमा हज़रात की इस मोज़ू पर लिखी हुई मुस्तनद किताब मुताअला में रखे, और मुश्किल मक़ाम पर निशान लगा कर रख ले, फिर जा कर उनसे समझ ले,*
*❁ •2- दूसरा काम ये करे कि अल्लाह ताला से हर मामले में आसानी की दुआएं करने के साथ अपने किसी संजीदा सोच वाले शादी शुदा क़रीबी बा एतमाद दोस्त या रिश्तेदार से ज़रूरतन कुछ तजुर्बे की बात मालूम कर ले,*
*❁ •बस इतना काम कर लेने से भी आपके दिल का होल या अनजानी सी परेशानी या अनोखी सी घबराहट खासी कम बल्कि खत्म हो जाएगी,*
*❁ •और आप होने वाली मनकुहा के लिए खूब दुआएं भी करें, इससे खुद बा खुद मिन जानिब अल्लाह उसके दिल में भी आपकी मुहब्बत पैदा होगी,*
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*®___ तोहफा ए दूल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 22 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ _क्या शोहर मिजाज़ी खुदा होता है ?*
*❁ • _ सवाल- शोहर के मिजाज़ी खुदा होने का तसव्वुर भी माशरे में आम है और इसे ग़ालिबन शरई हुक्म तसव्वुर किया जाता है, शरीयत में इस तसव्वुर की क्या हैसियत है ?*
*❁ • _ जवाब- अल्लाह तआला ने मर्द को औरत पर हाकिम बनाया है, मगर ना वो हक़ीक़ी खुदा है और ना मिजाज़ी खुदा, हाकिम की हैसियत से उसे बीवी पर ज़ुल्म व सितम तोड़ने की इजाज़त नहीं, ना उसकी तहकी़र व तज़लील (ज़लील व रुसवा) करने की इजाज़त है,*
*❁ • _ जो शोहर अपनी बीवियों पर ज़्यादती करते हैं वो बदतरीन क़िस्म के ज़ालिम हैं, आपको अपनी बीवी से हुस्ने सुलुक के साथ पेश आना चाहिए और जो ज़ुल्म व ज़्यादती कर चुके हैं, उसकी तलाफ़ी करनी चाहिए,*
*❁ • _ शोहर को ख़ुदाई मनसब पर फ़ाइज़ समझना गैर क़ोमो का तरीक़ा हो तो हो इस्लाम का तरीक़ा बहर हाल नहीं, अलबत्ता औरत को अपने शोहर की इज़्ज़त व अहतराम का यहाँ तक इस्तहबाबी हुक्म है कि उसका नाम ले कर भी ना पुकारे और उसके किसी भी ज़ायज़ हुक्म को ना टाले,*
*❁ • _ अगर शोहर से औरत का दिल ना मिलता हो, ख्वाह शोहर की बद सूरती की वजह से ख्वाह उसकी बद खलक़ी की वजह से, ख्वाह उसकी बद दीनी की वजह से, ख्वाह किसी और वजह से, तो उसको खुला लेने की इजाज़त है,*
*❁ • _ शोहर के मिजाज़ी खुदा होने के शरई हुक्म होने की गलत फहमी गालिबन इस हदीस से पैदा हुई है जिसमें आन हज़रत ﷺ ने इरशाद फ़रमाया है कि अगर अल्लाह के सिवा किसी को सजदा करना जायज़ होता तो मैं औरत को हुक्म देता कि अपने शोहर को सजदा करे, (मिश्कात -2/282)*
*❁ • _ लेकिन मज़कूरा बाला सवाल व जवाब से बाखूबी वाज़े (स्पष्ट) हो गया कि इस तसव्वुर का इस्लामी शरीयत से कोई ताल्लुक नहीं,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा __,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 23 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ बीवी को शरई अहकाम पर अमल करने से ना रोके (1),*
*❁ • आपकी बीवी जबकि अल्हम्दुलिल्लाह सही अकीदे की पाबंद है, अफआल, बिद'आत और जहालत भरी शिर्किया रस्मों से बचती है, उसको दीनी तालीम ही ऐसी मिली है कि जिस खुश नसीब को मिल जाए तो क्या कहना !*
*❁ • तो फिर आप इस बिना पर कि आप उसके शोहर हैं, उस पर ऐसे अहकाम क्यों लगाते हैं कि “मेरी वालिदा के यहाँ ”कूंडे" होते हैं, तुम्हें भी उसमें ज़रूर शामिल होना पड़ेगा,*
*❁ •मोहल्ले में फलां जगह चालीसवे की दावत है, तुम्हें भी वहाँ मेरी नुमाइंदगी के लिए ज़रूर जाना होगा, वगेरा वगेरा,*
*❁ •जो चीज़ हज़रत नबी करीम ﷺ और हज़रात ए सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम से साबित नहीं (बल्कि बिला शुबहा दीन में इज़ाफ़ा है) उनको अख़्तियार करने पर बीवी को क्यों मजबूर करते हैं?*
*❁ •आपको तो खुश हो जाना चाहिए कि आपको अल्लाह तआला ने फ़िज़ूल बख़ेडो़ और जहालत की रस्मों से बचने वाली बीवी अता फ़रमाई है,*
*❁ •फिर क्यों उसको इस भंवर में फंसाते हो कि वो शौहर की फ़रमाइश या हुक्म को अल्लाह तआला के हुक्म और नबी करीम ﷺ की लाई हुई शरीयत के अहकाम से बड़ा समझे और अपनी दीनी ज़िंदगी को अख्तियार ना कर सके ?*
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*®__ तोहफा ए दूल्हा __,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 24 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ बीवी को शरई अहकाम पर अमल करने से ना रोके (2),*
*❁ • अगर बीवी मुकम्मल पर्दा करती है और जहाँ तक हो सके इस मामले में अहतयात करती है हत्ताकि किसी गैर औरत के सामने भी सर के बाल और कलाईयाँ नहीं खोलती (और यही हुक्म ए शरई है) तो आपको क्या तकलीफ़ है कि उस पर नाराज़गी के बम बरसाएँ ?*
*❁ • अगर वो मोहल्ले के ऐसे घरानों की औरतों से मेल जोल नहीं रखना चाहती जो दीन से दूरी या गलत अक़ीदे रखती हैं और जिनसे बचना शर’अन ज़रूरी भी है, तो क्यों आप सिर्फ़ इस बिना पर कि उनकी दिलशिकनी होगी कि हमारी मजलिस में और हमारी तक़रीबात (प्रोग्राम) में फलां लोग नहीं आते, अपनी बीवी को गलत लोगों की गलत महफिलों में भेजने पर इसरार करते हैं?*
*❁ •किसी की दिलशिकनी से बचने के लिए क्या अपने दीन व ईमान को खराब करना सही है? फैसला हम आप पर छोड़ देते हैं,*
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*®__ तोहफा ए दूल्हा __,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 25 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞_ बीवी को शरई अहकाम पर अमल करने से ना रोके (3),*
*❁ • अगर बीवी आपके भाइयों (अपने देवर, जेठ) और अपने और आपके खालाज़ाद, चाचाज़ाद, फूफीज़ाद, मामूज़ाद और आपके चाचाओं, मामूओं से मुकम्मल तोर पर पर्दा करती है,*
*❁ • और आपके दोस्तों के सामने भी नहीं आती है और ऐसी तक़रीब (प्रोग्राम) में भी जाने से बचती है जहाँ उनका सामना या मेल जोल हो, तो आप क्यों उसको नुमाइश की चीज़ बनाकर सबके सामने ला रहे हैं? क्या सिर्फ इस लिए कि वो भी तो अपनी बीवियां सामने लाते हैं?*
*❁ •तो हज़रत आपसे आजिज़ाना अर्ज़ ये है कि वो लोग अपनी बीवियों के नज़ारे इसिलिए करा रहे हैं कि बदले में दूसरों की बीवियों के नज़ारे करें,*
*❁ •याद रखिए! इन सब गिरी हुई और हराम हरकतों का अंजाम सिवाये अल्लाह तआला की नाराज़गी और दुनिया में मुख़्तलिफ़ परेशानियों और बलाओं के नाज़िल होने और मौत के बाद जहन्नम में जलने के सिवा कुछ नहीं,*
*❁ •अल्लाह तआला हम सबकी हिफ़ाज़त फ़रमाएँ, आमीन,*
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*®__ तोहफा ए दूल्हा __,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 26 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ _ तीन सुनहरी उसूल :-(1)*
*❁ • (1)_ मेरे प्यारे भाई! अपनी निगाहों की खूब हिफाज़त करें, अक्सर ऐसा होता है जब आदमी अपनी निगाहों की हिफाज़त नहीं करता तो उसकी बीवी चाहे कितनी भी खूबसूरत हो लेकिन उसका दिल कभी पाक दामन नहीं रहता, शैतान हमेशा उसको अपने जाल में फंसाए रखता है,*
*❁ • और ब्यूटी पार्लर के करिश्मे और मेकअप वाली हर औरत को अपनी बीवी से ज़्यादा हसीन समझकर अपने आपको ज़िंदगी भर परेशान रखता है, इसलिए इस मर्ज़ से बचने की खूब दुआएं मांगे,*
*❁ • यह बहुत ही बुरा मर्ज़ है, रूहानियत को तबाह कर देता है, और चाचा ज़ाद मामू ज़ाद बहनें, भाभियाँ और खानदान की जितनी नामेहरम औरतें हैं उनसे बतौर खास अपनी निगाहों की खूब हिफाज़त करें,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 27 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ _ तीन सुनहरी उसूल :-(2)*
*❁ • (2) मेरे प्यारे भाई! ये सोचें कि मेरी क़िस्मत में यही लिखी हुई थी, सब जोड़े मुकद्दर होते हैं, अल्लाह तआला के लिखे बगेर कुछ नहीं होता, अब जो अल्लाह तआला ने लिख दिया, उस पर बंदे को राज़ी रहना चाहिए,*
*❁ •_ अल्लाह तआला के हर फ़ैसले पर राज़ी रहना और उस पर शुक्र करना, ये बंदे का बड़ा कमाल और बड़ा ऐज़ाज़ है, अल्लाह तआला हम सबको तोफ़ीक़ अता फ़रमाए, अपने शुक्र गुज़ार बंदों में शामिल फ़रमाए, (आमीन)*
*❁ •_ हज़रत थानवी रह. फ़रमाते हैं कि मोमिन की वो घड़ी बड़ी मनहूस है जिस घड़ी में वो अल्लाह तआला की नाफरमानी करता है, मसलन किसी ना- मेहरम औरत को देखता है, अपनी हलाल बीवी को छोड़ कर किसी के हुस्ने हराम पर नज़र डालता है,*
*❁ •_ बल्कि मोमिन की शान ये है कि अगर कहीं अचानक नज़र पड़ भी जाए तो फौरन नज़र हटाकर ये कहता है कि मेरी बीवी से बढ़कर दुनिया में कोई हसीन नहीं है, पूरी कायनात में उसका मिस्ल नहीं है, लिहाज़ा मै अल्लाह पाक की रज़ा पर राज़ी हूँ_,*
★•
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 28 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ _ तीन सुनहरी उसूल :-(3)*
*❁ • (3) मेरे प्यारे भाई! कभी भी किसी से उम्मीद न रखें (चाहे वो माँ-बाप हो या बीवी या औलाद या क़रीबी दोस्त वगेरा) सिवाए अल्लाह तआला के,*
*❁ • क्योंकि इंसान को जब भी कोई तकलीफ़ पहुँचती है (जो ज़्यादातर अपनों से ही पहुँचती है, और गैरों से तकलीफ़ पहुँचना तो कोई गैर-मामूली बात नहीं) इसकी वजह यही होती है कि उसकी किसी से वाबस्ता उम्मीद पूरी नहीं होती,*
*❁ • जब इंसान किसी से, मसलन अपनी औलाद से ये उम्मीद रखता है कि वो मेरा कहना मानेगी और मेरी खिदमत करेगी और वो औलाद नाफरमान हो जाए, या फ़रमाबरदार हो मगर मिज़ाज के फ़र्क़ की वजह से अपनी मर्ज़ी के फ़ैसले करें तो तकलीफ़ पहुंचना लाज़मी है,*
*❁ • यही मामला शोहर बीवी का भी है, लिहाज़ा अपनी बीवी से कोई उम्मीद न रखें, इंशा अल्लाह तआला आपको कोई तकलीफ़ पहुंचेगी ही नहीं और अल्लाह ना करे अगर कोई तकलीफ़ पहुंची भी तो उसका असर जल्दी ख़त्म हो जाएगा,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा__,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 29 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ _ अहसान और अज़दवाजी ज़िन्दगी_,*
*❁ • _अहसान के मानी है कि अल्लाह तआला की इबादत इस ध्यान के साथ की जाए जैसे इबादत करने वाला अल्लाह तआला को देख रहा है या कम अज़ कम इस ध्यान के साथ कि अल्लाह तआला उसे देख रहे है,*
*❁ • _ डॉक्टर मुहम्मद अब्दुल हई साहब आरिफी रह. फरमाते हैं कि अहसान वाक़ई बड़ी नियामत है जिसके हासिल होने पर शुक्र अदा करना चाहिए, लेकिन क्या अहसान का ये दर्जा सिर्फ नमाज़ ही में हासिल है या जब आप अपनी बीवी बच्चों से या दोस्त अहबाब से कोई मामला करते हैं, उस वक़्त भी ये ध्यान बाक़ी रहता है?*
*❁ • _ फरमाया- बेशक नमाज़ और दूसरी इबादतों में ये ध्यान मतलूब है कि अल्लाह तआला मुझे देख रहा है, लेकिन इस ध्यान की ज़रूरत सिर्फ नमाज़ ही के साथ खास नहीं बल्कि ज़िंदगी के हर काम में इसकी ज़रूरत है, इंसान को लोगों के साथ ज़िंदगी गुज़ारते और मुख़्तलिफ़ मामलात अंजाम देते हुए भी ये ध्यान रहना चाहिए कि अल्लाह तआला मुझे देख रहे हैं,*
*❁ • _ खास तोर पर मियाँ बीवी का ताल्लुक़ ऐसा होता है कि वो एक दूसरे के लिए दम दम के साथ होते हैं, उनकी रफ़ाक़त में बेशुमार उतार चढ़ाव आते रहते हैं, बहुत सी नागवारियाँ भी पेश आती हैं, ऐसे मोके़ भी आते हैं जब इंसान का नफ़्स उन नागवारियों के जवाब में ना इंसाफ़ियों पर उभारता है,*
*❁ • _ ऐसे मोके़ पर इस ध्यान की ज़रूरत कहीं ज़्यादा है कि अल्लाह तआला मुझे देख रहे है, अगर ये एहसास ऐसे वक़्त दिल में पैदा न हो तो उमूमन इसका नतीजा ना इंसाफी और हक़ तलफी की सूरत में निकलता है,*
*❁ • _ आन हज़रत ﷺ की सुन्नत ये है कि आप ﷺ ने तमाम उम्र कभी अपनी अज़वाज मुतहरात के साथ तबई गुस्से और डांट डपट का मामला नहीं फ़रमाया,*
*❁ • _ और इस सुन्नत पर अमल की कोशिश में मैंने भी ये मश्क़ की है कि मैं अपने घर वालों पर गुस्सा ना उतारूं, चुनांचे मैं अल्लाह तआला के शुक्र के तोर पर कहता हूँ कि आज मुझे अपनी अहलिया के साथ रफ़ाक़त को 51 साल हो चुके हैं, लेकिन इस अर्से में अल्हम्दुलिल्लाह मैंने कभी उनसे लेहजा बदल कर भी बात नहीं की _,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा ___,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 30 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ _ अज़्दवाजी ज़िन्दगी_, ज़िन्दगी का सफ़र,*
*❁ •_बेशक क़ुरान ए करीम ने मर्दों को औरतों पर निगरां क़रार दिया है लेकिन आन हज़रत ﷺ ने अपने इरशादत और अपने अमल से ये बात वाज़े फ़रमा दी है कि निगरां होने का मतलब ये नहीं है कि मर्द हर वक़्त औरत पर हुक्म चलाया करे, बीवी के साथ खादिमा जेसा मामला करे,*
*❁ •_हक़ीक़त ये है कि खुद क़ुरान ए करीम ने ही एक दूसरी जगह मियाँ बीवी के रिश्ते को दोस्ती और मुहब्बत से ताबीर फ़रमाया है, और इसी आयत में शोहर के लिए बीवी को सुकून का ज़रिया क़रार दिया है (सूरह अर-रूम - आयत 21),*
*❁ •_इस्लाम ही की एक तालीम ये भी है कि जब कभी कोई इज्तिमाई काम किया जाए तो लोगों को चाहिए कि वो किसी को अपना अमीर बना ले ताकि काम नज़्म व ज़ब्त के साथ अंजाम पाए, यहाँ तक कि अगर दो शख्स किसी सफर पर जा रहे हों तब भी मुस्तहसन ये क़रार दिया गया है कि वो अपने में से किसी एक को अमीर बना लें, ख्वाह वो दोनों आपस में दोस्त ही क्यों ना हों,*
*❁ •_ अब जिस शख्स को भी अमीर बनाया जाए वो हर वक़्त दूसरे पर हुक्म चलाने के लिए नहीं, बल्कि सफर के मामलात की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए अमीर बनाया गया है,*
*❁ •_ जब इस्लाम ने एक मामूली से सफर के लिए भी ये तालीम दी है तो ज़िंदगी का तवील सफ़र इस तालीम से खाली कैसे रह सकता था,*
*❁ •_ लिहाज़ा जब मियाँ बीवी अपनी ज़िंदगी का मुश्तरक सफ़र शुरू कर रहे हों तो उनमें से शौहर को इस सफ़र का अमीर या निगरां बनाया जाता है क्योंकि इस सफ़र की ज़िम्मेदारियाँ उठाने के लिए जो जिस्मानी कुव्वत और जो सिफात दरकार है वो कु़दरती तोर पर मर्द में ज़्यादा रखी गई हैं,*
*❁ •_ लेकिन इस इंतज़ाम से ये हक़ीक़त नहीं बदल जाती कि दोनों के दरमियान असल ताल्लुक़ दोस्ती, मुहब्बत और उल्फत का ताल्लुक़ है और उनमें से किसी को ये हक़ नहीं है कि वो दूसरे के साथ एक नोकर का बर्ताव करे, या शौहर अपनी अमारत के मनसब की बुनियाद पर ये समझे कि बीवी उसके हर हुक्म की तामील के लिए पैदा हुई है, या उसे ये हक़ हासिल है कि वो बीवी से अपनी हर जायज़ या ना-जायज़ ख्वाहिश की तकमील कराये,*
*❁ •_ बल्कि अल्लाह तआला ने मर्द को जो कुव्वत और जो सिफात अता की हैं उनका तकाज़ा ये है कि वो अपने इस मनसब को जायज़ हुदूद में रहते हुए बीवी की दिलदारी में इस्तेमाल करे और उसकी जायज़ ख्वाहिशत को हत्तल इम्कान पूरा करे,*
*❁ •_ इसी तरह अल्लाह तआला ने बीवी को जो मुका़म बख्शा है और उसे जो हुकूक अता किए है, उनका तकाज़ा ये है कि वो अपनी खुदादाद सलाहियतें अपने शरीक़ ए जिंदगी के साथ तआवुन और उसे खुश रखने में सर्फ करे,*
*❁ •_ अगर दोनों ये काम करें तो ना सिर्फ ये कि घर दुनिया ही में जन्नत बन जाए, बल्कि उनका ये तर्ज़े अमल मुस्तक़िल इबादत के हुक्म में है, जो आखिरत की हक़ीक़ी जन्नत का वसीला भी है,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा ___,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 31 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ _ छूटी हुई सुन्नत ज़िंदा कीजिए,*
*❁ •_ हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि हुज़ूर अक्दस ﷺ जब घर तशरीफ़ लाते थे तो आपके लबों पर मुस्कुराहट होती थी,*
*❁ •_ सोचने की बात है कि आप ﷺ को उम्मत का कितना ग़म था और मशागिल की कितनी कसरत थी लेकिन इसके बावजूद आप घर तशरीफ़ लाते तो मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ दाखिल होते,*
*❁ •_ अपनी बीवी के पास मुस्कुराते हुए आना, ये सुन्नत आज छूटी हुई है, जो बेदीन हैं वो फिरौन बन कर आते हैं और जो दीनदार हैं वो गोया बायज़ीद बस्तामी और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और बाबा फरीदुद्दीन अत्तार बन कर आते हैं,*
*❁ •_ बीवी की तरफ मुहब्बत की निगाह से देखेंगे ही नहीं, बात बात पर झिड़केंगे, वो बेचारी बात करना चाहती है, ये तस्बीह लिए बैठे हैं, दिन भर वो बेचारी आपकी मुंतज़िर रही और आप घर आते ही तस्बीह ले कर बैठ गए, या बातों में या कारोबार की फिक्र में लग गए, या सवालात का अंबार लगा दिया कि ये काम कर लिया, मैंने कहा था वो हो गया? उसका क्या हुआ? क्यों नहीं हुआ? क्या करती रही इतनी देर से?... वगेरा वगेरा,*
*❁ •_ ये दोनों रवैये खिलाफे सुन्नत हैं, घर में अपनी बीवी के पास जाएं तो मुस्कुराते हुए जाएं, उससे बात करें, खैर खैरियत दरियाफ्त करें, उसके कामों में हाथ बटाकर सुन्नत ज़िंदा करें और अल्लाह तआला को खुश करें, तस्बीहात और नवाफिल से ज़्यादा सवाब उस वक्त ये है कि बीवी का हक़ अदा किया जाए,*
*❁ •_ अपने हाथ से बीवी को खिलाने और उसको खुश करने की खातिर कोई चीज़ खरीदने में भी सवाब मिलता है, लिहाजा ये तरीके जिंदा कीजिए,*
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*®_ तोहफा ए दुल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 32 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ नर्म लहजा और मीठी जुबान,*
*❁ • शोहर के लिए इंतेहाई ज़रूरी है कि नर्म लहजा और मीठी जुबान का हामिल हो, बगैर मीठी जुबान और नर्म लहजा के प्यार और मुहब्बत महज़ एक दिखावा है,*
*❁ • _ जिस घर में मियाँ बीवी नर्म लहजा और मीठी जुबान इस्तेमाल करने के आदी हों वहाँ प्यार और मुहब्बत की फरावानी होती है जिसकी झलक घर के हर फर्द में दिखाई देती है,*
*❁ • _ आप इस आसान नुस्खे का तजुर्बा कर के देखिए, इंशा अल्लाह तआला आपकी तमाम परेशानियाँ काफ़ूर हो जाएँगी, बीवी आपसे दिली मुहब्बत करने लगेगी, बच्चों के दरमियान मुहब्बत और शफ़क़त का जज़्बा बढ़ेगा और वो घर के बाहर भी यही ज़ुबान इस्तेमाल करेंगे, कितना ही अहम मामला हो कोशिश करें कि आपका नर्म लहजा छूटने ना पाए,*
*❁ • _ याद रखें! बीवी और बच्चों की गलती पर चीख़ व पुकार और ग़ैज़ वो ग़ज़ब उस बुराई या गलती का सदबाब नहीं कर सकता, अगर आप चाहते हैं कि आपका घर खुशियों और मसर्रतों का गहवारा हो तो बराए मेहरबानी आज ही से आप अपना लहजा नर्म और ज़ुबान मीठी बनाएं,*
*❁ • सिर्फ़ हर शख़्स इतना ही सोच ले कि वो सुलूक और वो अल्फ़ाज़ जो मैं बीवी के लिए इस्तेमाल करना चाहता हूँ अगर वो मुझको कहे या यही सुलूक कोई दूसरा मेरे साथ करे तो क्या मैं उससे रंजीदा खातिर ना होऊंगा? अगर ये मुश्किल हो तो ये सोच ले कि मै बीवी होता तो मैं अपने लिए क्या पसंद करता?*
*❁ • _ याद रखिए ! जुबान देखने में तो गोश्त का बे ज़रर लोथड़ा है, लेकिन तलवार से ज़्यादा तेज़ है, जिसके लगाए हुए ज़ख्मों को उम्र भर नहीं भरा जा सकता,*
*❁ • _ याद रखिए! बात चीत करने का सलीका़ भी एक बहुत बड़ा फन है, दूसरों की बात को तहम्मुल और सब्र से सुनना भी उतना ही मुश्किल है जितना आला गुफ़्तगू करना, लिहाज़ा अगर बीवी कभी कोई बात आपसे कहना चाहती है तो खामोशी के साथ उसको सुनिए, उसके दिल के जज़्बात, ख़यालात, अहसासात का भी ख़याल रखिए,*
*❁ • _ याद रखिए! नर्म लहजा और मीठी ज़ुबान एक ऐसा जादू है जो हमेशा अपने सामने वाले पर असर अंदाज़ होता है, मीठी ज़ुबान ऐबों पर पर्दा डाल देती है, बद ज़ुबानी दुनिया भर की खूबियों पर पानी फ़ेर देती है,*
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*®_ तोहफा ए दुल्हा __,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 33 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ बीवी की तारीफ भी करनी चाहिए,*
*❁ • जिसके साथ ताल्लुक हो, उससे मुहब्बत हो ही जाती है और जिसकी खूबियों का इस्तेहजा़र हो, उसकी मुहब्बत भी दिल में आती है, लिहाज़ा अपनी बीवी की खूबियों पर नज़र रखें, खुद बा खुद उसकी मुहब्बत दिल में पैदा होगी, उसकी तारीफ कीजिए, उसके दिल में आपकी मुहब्बत पैदा होगी,*
*❁ • जिसके दिल में ये एहसास हो कि ये बीवी खाना पकाने की जो खिदमत अंजाम दे रही है, ये उसका हुस्न ए सुलूक और हुस्न ए मामला है जो वो मेरे साथ कर रही है, तो वो उसके खाने पकाने की तारीफ करेगा, उसकी हिम्मत बंधाएगा, उसका हौसला बढ़ाएगा,*
*❁ • लेकिन जो शख्स अपनी बीवी को नोकरानी या खादिमा समझता हो और खाना पकाना उसकी ज़िम्मेदारी समझता हो, ऐसा शख्स कभी अच्छे खाने पकाने पर भी अपनी बीवी की तारीफ नहीं करेगा और नमक की ज़्यादती या चीनी की कमी पर ही घर में क़यामत बरपा कर देगा और लंबा चौड़ा झगड़ा शुरू कर देगा,*
*❁ • औरत फ़ितरी तौर पर नर्म दिल होती है, थोड़ी सी तारीफ पर फूले नहीं समाती, आइंदा उसी काम को (जिसकी तारीफ हुई है) और अच्छा कर के दिखाती है,*
*❁ • लिहाज़ा हर चीज़ मुसब्बत अंदाज़ में बीवी को समझाएँ जितना काम हो उस पर उसकी तारीफ करें, जो ऐब या कोताही बाक़ी रह गई, इस तरह समझाइए कि आईंदा ऐसा न हो, और आज से ही मामूल बना लें कि छोटे छोटे काम पर, बीवी के चाय पकाने पर, पानी का गिलास पेश करने पर उसको "जज़ाकल्लाहु खैरा" (अल्लाह तआला तुम्हें इसका बेहतरीन अजर् अता फ़रमाए) कहिए, दिल व ज़ुबान से शुक्र गुज़ार बनिए, फिर देखिए बीवी भी आपकी कैसी क़द्रदान बनती है, दुनिया ही में हूर का नमूना आपके सामने आ जाएगा, ऐसे ही मियाँ बीवी का घर दुनिया ही में जन्नत का नमूना बन जाता है,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा __,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 33 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ _ बीवी एक बेहतरीन दोस्त _,*
*❁ • आम तोर पर एक शौहर अपनी बीवी की नज़र में उस वक़्त अच्छा बन सकता है जब वो घरेलु कामों में उसका हाथ बटाए, उसके आराम और राहत का ख़्याल रखे, घरेलु मामलात में उसको साथ ले कर चले और उसके मशवरे को अहमियत दे और हुदूद ए शरीयत के अंदर रहते हुए उसको अख्तियार और आज़ादी भी दे,*
*❁ • बीवी के साथ इस क़िस्म का रवैय्या रखने से कोई शौहर अपनी बीवी का गुलाम नहीं बनेगा, बल्कि उसका दिल मोह लेगा और इस क़िस्म का रवैय्या बीवी का हक़ भी है,*
*❁ • इसलिये कि वो रफ़ीका ए हयात बन कर तुम्हारे घर आई है, वो तुम्हारी राज़दार है, तुम्हारी मुखलिस दोस्त है, तुम्हारे बच्चों की माँ है, वो तुम्हारी जलवत और ख़लवत की साथी है, वो तुम्हारी इज़्ज़त है, वो तुम्हारा लिबास है,*
*❁ • वो तुम्हें गुनाहों से बचाने का एक महफूज़ क़िला है, वो तुम्हारा निस्फ ईमान है, वो इफलास, तंगदस्ती, गुरबत, बीमारी, दुःख दर्द और तकलीफ में भी तुम्हारा साथ देने वाली है, वो तुम्हारे तमाम कमालात और तमाम ऐबों से वाक़िफ है...और तुम्हारे सुकून हासिल करने का बहुत बड़ा ज़रिया है,*
*❁ • ईमानदारी से बताइए! जिस शख्सियत का आपके साथ इतना गहरा ताल्लुक हो, उसका इतना हक नहीं कि उसकी कोई बात मानी जाए ?*
*❁ • गोर कीजिए ! अगर आपका कोई गहरा दोस्त हो और वो आपसे किसी काम के लिए कहे तो क्या आप उसे इन्कार कर देंगे? हरगिज नहीं आपको इन्कार की जुर्रत भी ना होगी, इसलिए कि आपको दोस्ती का भरम रखना है, उसको निभाना है, आपको दोस्ती ख़त्म हो जाने का डर होगा, जब एक आम दोस्त के साथ इस तरह का रवैय्या नहीं रखा जाता तो बीवी तो सबसे क़रीबी दोस्त है,*
*❁ • याद रखो! कि तुम्हारे और तुम्हारी बीवियों के दरमियान अल्लाह तआला की ज़ात मौजूद है, अल्लाह तआला के हुक्म और उसके मुकर्रर किए हुए ज़ाब्ता ए निकाह के मुताबिक़ वो तुम्हारी बीवी है और तुम्हारे लिए हलाल हुई है, वो अल्लाह तआला की अमान में तुम्हारी मातहत और ज़ेरे दस्त बनाई गई है,*
*❁ • अगर तुम उनके साथ ज़ुल्म करोगे तो अल्लाह तआला की दी हुई अमान को तोड़ोगे और उसके मुजरिम होगे,*
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*®___ तोहफा ए दुल्हा ___",*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 34 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ _ खतरनाक गलतियाँ _,*
*❁ •बच्चों के सामने आप बीवी से झगड़ा ना करें, अगर बहुत ही ज़्यादा गुस्सा आए तो फौरन घर से बाहर चले जाएं, बच्चों के सामने हरगिज़ हरगिज़ उसको ना झिड़कें ना डांटें,*
*❁ •क्योंकि इससे एक तरफ तो बीवी की इज़्ज़त ए नफ़्स मजरूह होगी और दूसरे बच्चों के दिल में उसकी इज़्ज़त कम होगी और अगर बच्चे समझदार हों और माँ को बेकसूर समझते हों तो फिर आप उनकी नज़र में ज़ालिम और क़ाबिले नफ़रत ठहरेंगे,*
*❁ •इसके अलावा अगर बीवी भी उस वक़्त बोल पड़ी और आप दोनों में तू तू मैं मैं होती रही तो ये बच्चों की नफ़्सियत के लिए बहुत ज़्यादा नुक़सान दह है,*
*❁ •आप ठंडे दिल से ज़रा गौर तो फ़रमाइए! जिस घर में हर वक़्त माँ बाप के दरमियान नोक झोंक, तू तू मैं मैं और सर्द जंग जारी रहे, गर्मा गर्मी, चीख पुकार, नफ़रत और गुस्से के बम बरसाए जा रहे हो, एक दूसरे की तहकी़र की जा रही हो, ज़रा ज़रा सी बात पर भड़क उठना और ज़िद और हठ धर्मी दोनों का मामूल हो, ऐसे माहौल में मासूम और फूलों से ज़्यादा नाज़ुक बच्चों के दिल व दिमाग पर कैसा असर पड़ेगा?*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा ____,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 35 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ औरतों की जहालत और बद की तमीज़ी का इलाज,*
*❁ • अगर औरतों की जहालत और बद तमीज़ी से दिल दुखता है, तकलीफ़ बहुत होती है तो इसका इलाज भी तो मुमकिन है,*
*❁ • उनको दीन की किताबें पढ़ाओं, पर्दे में उल्मा और बुज़ुर्गों के बयान सुनाओ, तब्लीगी, तालीमी सिलसिले में दीनदार मस्तूरात के माहौल में जोड़ो, घर में एक वक़्त मुतय्यन कर के हदीस की कोई किताब ले कर उसको पढ़ो, उसमें बच्चे और घर के तमाम महरम अफ़राद बैठ कर सुनें,*
*❁ • इस तरह करने से उन्हें सलीक़ा और तमीज़ भी बा क़द्रे ज़रूरत आ जाती है, क्योंकि दीन की तालीम से अख़लाक़ दुरुस्त हो जाते हैं, अल्लाह तआला की नाफरमानियों का खौफ़ दिल में पैदा होता है, शौहर के हुक़ूक़ की पहचान होती है और हुक़ूक़ अदा करने की सलाहियत भी पैदा हो जाती है,*
*❁ • शरीयत की तालीम ये है कि जहाँ तक मुमकिन हो औरत को राहत दो, उसको परेशान मत करो, नान नफ़्का़ वुसअत के साथ दो, उसकी दिलजोई करो, अगर बीवी की वाक़ई गलती हो जब भी उसको माफ़ करना चाहिए, उसकी तरफ से मिलने वाली ईज़ाओ पर सब्र करने से दर्जे बुलंद होते हैं, उसकी बहुत सी ईज़ाओ पर सब्र करो और हक़ तआला के अजर् के वादे पर नज़र रखो,*
*❁ • मुसलमान शोहरों को बीवियों के साथ हुज़ूर अकरम ﷺ वाले तर्जे अमल और हुस्ने माशरत के मुवाफ़िक़ अमल करना चाहिए,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा ___,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 36 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ सास ससुर की खिदमत वाजिब नहीं,*
*❁ • एक बात और समझ लीजिए जिसमें बड़ी कोताही होती है, वो ये कि जब औरत के ज़िम्मे शोहर का और उसकी औलाद का खाना पकाना वाजिब नहीं, तो शोहर के जो माँ-बाप और बहन भाई हैं, उनके लिए खाना पकाना और उनकी खिदमत करना बा तरीक़े अवला वाजिब नहीं,*
*❁ • हमारे यहाँ ये दस्तूर चल पड़ा है कि जब बेटे की शादी हुई तो उस बेटे के माँ-बाप ये समझते हैं कि बहू पर बेटे का हक़ बाद में है और हमारा हक़ पहले है। लिहाज़ा ये बहू हमारी हमारी खिदमत ज़रूर करे, चाहे बेटे की खिदमत करे या ना करे,*
*❁ • खूब समझ लीजिए! अगर वालदैन को खिदमत की ज़रूरत है तो लड़के के ज़िम्मे वाजिब है कि वो खुद उनकी खिदमत करे, अलबत्ता उस लड़के की बीवी की सआदत मंदी है कि वो अपने शोहर के वालदैन की खिदमत भी खुश दिली से अपनी सआदत और बाइस ए अजर समझ कर अंजाम दे,*
*❁ • लड़के को ये हक़ नहीं पहुंचता कि वो अपनी बीवी को अपने वालदैन की खिदमत करने पर मजबूर करे, जबकि वो खुश दिली से उनकी खिदमत पर राज़ी ना हो, और ना वालदैन के लिए ज़ायज़ है कि वो अपनी बहू को इस बात पर मजबूर करें कि वो हमारी खिदमत करे,*
*❁ • लेकिन अगर वो बहू खुश दिली से अपनी सआदत मंदी समझ कर अपने शोहर के वालदैन की जितनी खिदमत करेगी, इंशा अल्लाह उसके अजर् में बहुत इज़ाफ़ा होगा, उस बहू को ऐसा करना भी चाहिए ताकि घर की फ़िज़ा खुश गंवार रहे,*
*❁ • लेकिन साथ ही दूसरी जानिब सास, ससुर और शोहर को भी ये समझना चाहिए कि अगर ये खिदमत अंजाम दे रही है तो ये उसका हुस्ने सुलूक है, उसका हुस्ने अख़लाक़ है, उसके ज़िम्मे ये खिदमत फ़र्ज़ वाजिब नहीं है, लिहाज़ा उनको चाहिए कि वो बहू की इस खिदमत की क़द्र करें और उसका बदला देने की कोशिश करें,*
*❁ • इन हुकूक और मसाइल को ना समझने के नतीजे में आज घर के घर बर्बाद हो रहे हैं, सास बहू की और भावज और ननदों की लड़ाइयों ने घर के घर उजाड़ दिए, ये सब कुछ इसलिए हो रहा है कि हुकूक की वो हुदूद जो नबी करीम ﷺ ने बयान फरमाई है, वो ज़ेहनो में मोजूद नहीं है,*
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*®___ तोहफा ए दुल्हा _,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 37 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ _बीवी को जेब खर्च अलग दिया जाए _,*
*❁ •आम तौर पर जिन बातों की तरफ से ग़फलत पाई जाती है, उनमें पहली बात वो यह है कि नफ़्क़ा सिर्फ़ ये नहीं है कि बस खाने और कपड़े का इंतज़ाम कर दिया, बल्कि नफ़्क़ा का एक हिस्सा ये भी है कि खाने और कपड़े के अलावा भी कुछ रक़म बतौर जेब खर्च के बीवी को दी जाए जिसको वो आज़ादी के साथ अपनी ख्वाहिश के मुताबिक खर्च कर सके,*
*❁ •कुछ रक़म बीवी के पास ऐसी ज़रूरियात के लिए भी होनी चाहिए, ताकि वो दूसरे की मोहताज न हो, ये भी नफ़्क़ा का एक हिस्सा है, जो लोग ये जेब खर्च नहीं देते, वो अच्छा नहीं करते,*
*❁ •दूसरी बात ये है कि खाने पीने में अच्छा सुलूक करो, ये ना हो कि सिर्फ खाना दे दिया बल्कि अहसान करो और अहसान का मतलब ये है कि इंसान अपनी आमदनी के मैयार के मुताबिक़ फराखी और कुशादगी के साथ घर का खर्चा उसको दे,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 38 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ चार महीने से ज़्यादा सफ़र में बीवी की इजाज़त:-*
*❁ •हदीस के तहत फुक़्हा किराम ने यहाँ तक लिखा है कि मर्द के लिए चार महीने से ज़्यादा घर से बाहर रहना बीवी की इजाज़त और उसकी खुश दिली के बगेर जाइज़ नहीं,*
*❁ •हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपनी तमाम हुकुमत में ये हुक्म जारी फ़रमाया था कि जो मुजाहिदीन घर से बाहर रहते हैं, वो चार महीने से ज़्यादा घर से बाहर ना रहें,*
*❁ •और इसी वजह से फुक़्हा किराम ने लिखा है कि अगर किसी शख़्स को चार महीने से कम का सफ़र दरपेश हो तो उसके लिए बीवी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं, लेकिन अगर चार महीने से ज़्यादा का सफ़र दरपेश हो तो उसके लिए बीवी से इजाज़त लेनी ज़रूरी है, चाहे वो सफ़र कितना ही बा बरकत क्यों न हो,*
*❁ •हत्ताकि अगर हज का सफ़र हो तो उसमें भी अगर वो चार महीने के अंदर वापस आ सकता है, तो फिर इजाज़त की ज़रूरत नहीं, अगर निफ़्ली तौर वहाँ ज़्यादा क़याम का इरादा है तो फिर इजाज़त लेनी ज़रूरी है, यही हुक्म दावत व तब्लीग के सफ़र का है,*
*❁ •लिहाज़ा जब इन मुबारक सफ़रों में बीवी की इजाज़त ज़रूरी है तो फिर जो लोग मुलाज़मत के लिए पैसा कमाने के लिए लंबे सफ़र करते हैं, उनमें तो बा तरीक़ अवला बीवी की इजाज़त ज़रूरी है, अगर बीवी की इजाज़त के बगैर जाएंगे तो ये बीवी की हक़ तलफी होगी और शर'अन ना-जा'इज़ होगा और गुनाह होगा,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा ___,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 39 ▦*
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*⊙ वालदैन को नसीहत ⊙*
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*☞_ बेटे और बहू को अलग ना रहने देना ज़ुल्म है :-*
*❁ •एक ज़ुल्म बहू पर और भी होता है जिसमें दीनदारी के मुद्दई दम भरने वाले बा कसरत मुब्तिला हैं, वो ये कि बहू अपने शौहर के साथ अलग रहना चाहे तो अलग नहीं करते, कहते हैं कि घर की हवा (बरकत) निकल जाएगी, पुरानी बूढ़ी औरतों के ज़्यादातर ऐसे ही ख़्यालात होते हैं,*
*❁ •याद रखो ! हक़ तआला की मासियत में किसी की इता'त नहीं, एक हांडी में पकने की वजह से बरकत तो ज़रूर आएगी, लेकिन लड़ाई झगड़े की वजह से जो घर में नफ़रत, हसद, बुग़्ज़, गीबत का दरवाज़ा खुल जाता है, वो पूरे घर को अल्लाह की रहमत से दूर कर देता है, ऐसी एक बरकत के लिए हज़ारों मासियत और गुनाहों का इरतक़ाब कैसे जायज़ होगा?*
*❁ •अगर बहू अपने शौहर के साथ अलग रहना चाहे तो अलग रहना उसका हक़ है और ज़रूरी है, बल्कि इस ज़माने में यही मसलिहत है कि अलग रहें, साथ शामिल रहने में बहुत से फ़साद हैं, ये पुरानी औरतें अक्सर बहुओं को बहुत सताती हैं,*
*❁ •लिहाज़ा अगर आप चाहते हैं कि बेटे और बहू में खूब मुहब्बत हो, उनके झगड़े न हों, आने वाली औलाद सुकून से रहे, बहू मायके जा कर न बैठे, बेटे और बहू में तलाक़ की नोबत न आए, आपकी मुहब्बत बेटे से बरकारार रहे, बच्चे और बहू आपकी इज़्ज़त करें, तो इसका आसान हल यही है,*
*❁ •अलग न रखने की वजह अक्सर ये होती है कि मां बाप चाहते हैं कि बहू हमारी खिदमत करे, हमने इतने सालों बेटे को पाला, परवान चढ़ाया है, अब ज़ईफ़ी की उम्र में बहू के हाथ की रोटियां भी हम न खाएं?*
*❁ •इसका पहला जवाब तो दुल्हा के वालिद के लिए ये है कि जब रात दिन घरों में झगड़े होंगे, तो आपके बेटे और बहू सुकून और इत्मीनान, राहत व आराम की ज़िंदगी नहीं गुज़ार सकेंगे, आपकी बीवी और बहू के दरमियान हर वक़्त लड़ाई झगड़े का बाज़ार गरम रहेगा,*
*❁ •लिहाज़ा आपकी परेशानियों को खत्म करने का बेहतरीन हल ये है कि शादी की पहली रात ही से बेटा बहू को खुद से अलग रखें,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा _____,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 40 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ चंद लफ़्ज़ों में खुलासा,*
*❁ •1- मियाँ बीवी जब तक नेक नहीं होते, तब तक एक नहीं होते, इसलिए खुद भी नेक बनिए और अपनी अहलिया को भी नेक बनाने की कोशिश कीजिए,*
*❁ • 2- शादी श के तीन नुक़्तों के बग़ैर (यानी सादी) सादगी से करने की कोशिश कीजिए, इंशा अल्लाह तआला बहुत ही खैर व बरकत का ज़हूर होगा,*
*❁ •3- मेहर ए फ़ातमी (131 तोला 3 माशा चाँदी या इसकी क़ीमत) मुक़र्रर कीजिए और फ़ौरन अदा करने की कोशिश कीजिए कि ये बहुत ही बेहतर है,*
*❁ •4-ज़हेज़ का मुतालबा ना ज़बान से ना दिल से करो, ये मर्द की गैरत के खिलाफ है कि वो बीवी से किसी क़िस्म का माली मुतालबात करे या इसकी तमन्ना करे, जो कुछ माँगना हो वो अल्लाह ही से माँगें और फिर कोशिश शुरू कर दीजिए,*
*❁ •5-जहाँ तक हो सके अलग रहने की कोशिश कीजिए, इस ज़माने में दो बहुओं जैसी मुख़्तलिफ़ मिज़ाज औरतों का इक़ट्ठा रहना और फिर उस पर ननद और सास के साथ रहना घर की रही सही खुशगवार फ़िज़ा को कमज़ोर बना देती है,*
*❁ •6-बीवी से मुहब्बत पैदा होने के लिए अक्सीर नुस्खा और बेहतरीन तावीज़ ये है कि आप अपनी निगाहों की हिफाज़त कीजिए, जिनको देखना अल्लाह तआला ने नापसंद फरमाया है, जो उन्हें देखता है कभी भी अपनी बीवी से सच्ची मुहब्बत नहीं कर सकता, चाहे वो कितनी ही हसीन व ज़हीन क्यों ना हो, लिहाज़ा नामेहरम औरतों से खुसूसन भाभियों और खलाज़ाद, मामूज़ाद वगेरा से अपनी निगाहों की हिफाज़त कीजिए,*
*❁ •7- एक उसूल हमेशा याद रखिए, औरत की फितरत में है कि तारीफ से खुश होती है, इसलिए खुशगवार शादी शुदा ज़िंदगी गुज़ारने के लिए अपनी बीवी की तारीफ़ ज़रूर कीजिए, इससे आपकी बहुत सी घरेलू परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी और बहुत सी शिकायतें दूर हो जाएँगी,*
*❁ • 8- मियाँ बीवी के 90℅ झगड़े शोहर के घर से निकलते वक़्त या वापसी पर घर में दाखिल होते हुए होते हैं, लिहाज़ा इन दोनों वक़्त में खूब ख्याल रखिए, शैतान को बहकाने का मोका़ ना दीजिए, याद रखिए ! दो मुसलमानों में झगड़ा अल्लाह तआला की रहमत को दूर कर देता है,*
*❁ •9- वालिदा से अलग रहते हुए अपनी बीवी की ज़रिए उन्हें हदिए और अक्सर पका पकाया खाना भिजवाएं और खुद भी उनके घर खाली हाथ ना जाएं, कुछ न कुछ हदिया ज़रूर ले कर जाएं और अगर साथ रहते हैं तो वालिदा को इस बात का एहसास ना होने दीजिए कि मेरा बेटा मेरे मुक़ाबले में बीवी से ज़्यादा मुहब्बत करने लगा है,*
*❁ •याद रखिए ! बच्चे बच्चे ही होते हैं, उन्हें बुज़ुर्ग ना समझिए, उनकी वजह से अपनी बीवी से झगड़ा ना करें, एक दिन घर का पूरा चार्ज संभाल कर देखिए, इंशा अल्लाह सब कुछ समझ में आ जाएगा,*
*❁ •इसी तरह बच्चों की तरबियत की खातिर और जच्चा बच्चे की सहत का ख्याल रखते हुए दो बच्चों के दरमियान मुनासिब वक़्फ़ा (गेप) या शरई उज़्र की हालत में लंबा वक़्फ़ा कर लीजिए, यही मुनासिब है,*
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*®__ तोहफा ए दुल्हा __,*
•─━━━━━══════━━━━─•
*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 41 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
✰══❖═══▩ஜ۩۞۩ஜ▩═══❖══✰
*☞ _मिया बीवी में मुहब्बत के वज़ीफ़े ⊙ 1- पहला वज़ीफ़ा,*
*❁ • दो मुसलमानों में इख्तिलाफ़ या झगड़ा शैतान की सबसे बड़ी कामयाबी है, झगड़ा नेकियों को इस तरह मूंडता है जैसे उस्तरा बालों को मूंडता है, इसलिए झगड़े से बचने के लिए शैतान मर्दूद से बचने की बहुत ज़्यादा फ़िक्र की जाए,*
*❁ • जिन चीज़ों से घर में शैतान आते हैं उनसे बचा जाए और जिन आमाल से शैतान से हिफ़ाज़त होती है उन आमाल का अहतमाम किया जाए,*
*❁ • इसलिए एक अमल यह करें कि घर में “सूरह बक़रह” के नाम से पुकारे पढ़ कर शोहर या बीवी या कोई भी घर में, अपने ऊपर और पूरे कमरे पर दम कर दें,*
*❁ •हदीस में आता है,-” क़सम है उस ज़ात की जिसके क़ब्ज़े में मुहम्मद ﷺ की जान है कि शैतान उस घर में ठहर नहीं सकता जिसमें सूरह बक़रह की तिलावत की जाए,”*
*®_( किताबुज़्ज़ुहद व रक़ाइक ,1/609 हदीस 740 ),*
*❁ •और इसके साथ ही इसका अहतमाम किया जाए कि घर में किसी जानदार की तस्वीर न हो (अपने अपने बच्चों या अपने वाल्देन या किसी की भी तस्वीरें बिल्कुल न रखें), यहाँ तक कि दवा के डिब्बे या पाउडर के डिब्बे या तेल की बोतल पर जो तस्वीरें बनी होती हैं उनको भी काट दें या उन पर कोई स्टीकर चिपका दें,*
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*®___ तोहफा ए दुल्हा ___,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 42 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞ _मिया बीवी में मुहब्बत के वज़ीफ़े ⊙ दूसरा वज़ीफ़ा,*
*❁ • घर में कसरत से क़ुरान ए करीम की तिलावत का अहतमाम करें, हदीस में आता है:- जिस घर में क़ुरान ए करीम की तिलावत की जाती है उसमें खैरो बरकत ज़्यादा हो जाती है, फ़रिश्ते उसमें हाज़िर होते हैं और शयातीन निकल जाते हैं,*
*❁ • और जिस घर में तिलावत ना हो वो घर लोगों पर तंग हो जाता है, उसमें खैरो बरकत कम हो जाती है, शयातीन उस घर में अपना ठिकाना बना लेते हैं, फ़रिश्ते वहाँ से चले जाते हैं ,*
*❁ • इसलिए हर मुसलमान मर्द और औरत को चाहिए कि घर में रोज़ाना तिलावत का खूब अहतमाम करें,*
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*®___ तोहफा ए दुल्हा ___,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 43 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ मिया बीवी में मुहब्बत के वज़ीफ़े ⊙ 3-तीसरा वज़ीफ़ा – दो रकात नमाज़:-*
*❁ • शोहर इस बात का अहतमाम करे कि घर में जब भी दाखिल हो तो पहले दो रकात पढ़े, इसी तरह घर से बाहर जाना हो तो पहले दो रकात पढ़कर बाहर निकले, इससे भी इंशा अल्लाह तआला बहुत फ़ायदा होगा,*
*❁ • एक शख़्स ने अब्दुल्लाह बिन रवाहा रज़ियल्लाहु अन्हु की वफ़ात के बाद उनकी बेवा से निकाह किया और फ़रमाया, “तुम जानती हो मैंने तुमसे निकाह क्यों किया? मैंने तुमसे निकाह इसलिए किया कि तुम मुझे अब्दुल्लाह बिन रवाहा रज़ियल्लाहु अन्हु के अमल के बारे में बताओ कि उनके घर में क्या मामूलात थे,”*
*❁ •तो उनकी अहलिया मोहतरमा ने फ़रमाया, जब वो घर से निकलने का इरादा करते तो दो रकात नमाज़ पढ़ते और जब घर में दाखिल होते तो दो रकात नमाज़ पढ़ते और इस अमल पर हमेशा क़ायम रहते,”*
*®_ Ref_$_किताबुज़ ज़ुहद ,2/677,*
*❁ •हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हुमा फ़रमाती हैं कि हुज़ूर अकरम ﷺ जब भी घर से निकले हैं दो रकात पढ़कर निकले हैं,”*
*®_ Ref_$_किताबुज़ ज़ुहद, ,2/677,*
*❁ •लिहाज़ा दो रकात का अहतमाम हर मर्द और औरत को करना चाहिए, फर्ज़ो के साथ-साथ नवाफिल का अहतमाम खैरो बरकत का सबब होगा,*
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*®___ तोहफा ए दुल्हा ___,*
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*🪷 तोहफा ए दुल्हा 🪷*
*▦ पार्ट - 44 ▦*
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*⊙ दूल्हा को वसीयत ⊙*
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*☞_ मिया बीवी में मुहब्बत के वज़ीफ़े:-*
*❁ • 4- मंज़िल पढ़ने का अहतमाम करें और इसको पढ़कर घर में दम कर दें,इंशा अल्लाह तआला इससे भी बड़ा फ़ायदा होगा,*
*❁ • 5- आयते करीमा 100 मर्तबा पढ़ कर मुहब्बत के लिए दुआ मांगे,*
*❁ • 6- ”ला हवला वला कुव्वता इल्ला बिल्लाहि,” 40 मर्तबा पढ़ कर दुआ मांगें,*
*❁ • इन तमाम वजीफों के अहतमाम से बहुत फ़ायदा होगा, मुस्तक़िल पाबंदी से पढ़ें और अहतमाम से गुनाहों से बचें और दूसरों को बचाने की कोशिश करें,*
*❁ •कोई ऐसा काम न होने पाए जिससे अल्लाह तआला नाराज़ हो जाए, इसलिए कि अल्लाह की नाराज़गी के साथ दुनिया और आखिरत की कोई नियामत हासिल नहीं हो सकती,*
*❁• और अगर कभी गुनाह हो भी जाए तो फौरन तौबा इस्तग़फार करके गुनाहों की माफ़ी मांगने के लिए “,इस्तगफार की 70 दुआएं “(किताब खरीद कर उस किताब में से) रोज़ाना इस्तग़फार पढ़ें,*
*❁___अल्हम्दुलिल्लाह पोस्ट मुकम्मल हुई ,,,_*
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